Life History of Founder

The Founder

Late Sri K. P. Shrivastava was born on 2nd November 1919 at Jaijore near Siwan.He was an epitome of honesty, commitment, dedication and wisdom. He was one of the pioneers of educational movement in the district of Saran, Bihar. He was a great change-maker and socialist influenced by the eminent leaders of India’s freedom movement, like Braj Kishore Prasad, Jai Prakash Narayan, Dr. Rajendra Prasad, Yusuf Mehar Ali, AcharyaNarendraDeo, Anugraha Narayan Singh and above all Mahatma Gandhi. He was a true ‘karmayogi’. He abandoned his higher studies to actively participatein India’s freedom struggle. During the Quit India Movement of 1942, he was imprisoned for more than three years in Bhagalpur Central Jail.In the jail, there was a brutal cane chargeby the British administrationinwhich he was injured and suffered permanent impairment of his eye-sight. He was married to Smt.DharmashilaShrivastvain the year 1959.

After Independence, he dedicated his ideas, energy and vision on the programmes of constructive nation building and entered the field of education. After the initial years of strenuous efforts, he achievedhis first success with the foundation of Jai PrakashMahila College Chapra in the year 1955.This was the first Women’s College in any district headquarter of Bihar. This college is now a constituent unit of the Jai Prakash University, Saran. The second milestone in his efforts was the establishmentof Brajkishore Kindergarten.This was a novel experiment with the idea of learning while playing for small children. Brajkishore Kindergarten was established on 15th August 1957 to mark the centenary year of the First War of Indian Independence of 1857. To run the school he founded the Braj Kishore Memorial Trust in year 1977. Due to his intense hard work and honest dedication, the Trust went from strength to strength. Under his able leadership, the Trustacquired more than three acres of land on the Chapra by-passroadat Sandha, to establish theChapra Central School.This high secondary school is affiliated to CBSE, Delhi. On 19th April, 2000 he laid the foundation stone of the new building for the Chapra Central School. So far, 60 rooms along with labs have been constructed at thiscampus. A new administrative block has been added for theconvenience of the students and the guardians.

To encourage sports and games in the district, he donated two running trophies for the ‘District Inter School Cricket Tournament’. He played a major role in the establishment of PhaniBhushan Dance and Music Academy and the Ayurvedic College at Chapra.For the continuous progress of his mission in mass education he handed over the torch of light to the school family. The trusted members of this family are working with a missionary zeal to fulfill the great ambitions of the honourable founder secretary.

He passed away on 22nd July 2001.

May his soul rest in peace!

 

                                               संस्थापक सचिव स्व0 कपिलदेव प्रसाद श्रीवास्तव का जीवन वृत


विदित हो कि सन् 1935 में ब्रिटिश संसद ने भारतीयों को क्रमिक स्वशासन देने संबंधी अधिनियम पारित कर भारतीय नेताओं के आक्रोश में पलीता लगा दिया। पंडित जवाहर लाल नेहरू के आह्नान पर पूरा देश आन्दोलित हो गया। इस अधिनियम के विरोध स्वरूप रैलियों और गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया। छपरा में स्कूली छात्र रहे किसलय.किशोर कपिलदेव बाबू ने देव.देवियां तू एक ओर ऐ मातृभूमि तू एक ओरष्ष् के मनोभाव के साथ विद्यालय का परित्याग कर ब्रिटिश अधिनियम की खिलाफत रैली में सम्मिलित हो गये और जेलर के मना करनेे के बावजूद अन्य देश भक्तों के साथ छपरा जेल चले गये। बाल उत्साह और देशभक्ति के इस अनूठे उदाहरण के समक्ष शर्मसार हुए सरकारी तंत्र ने उसी दिन शाम कोए अल्पवयस्कता के आधार पर इन्हें जेल से छोड़ दिया। देश प्रेम से अप्लावित छपरा के छात्रों ने इनका अभिनन्दन किया और भावी संघर्श हेतु इन्हें अपना नेता चुना। हमारे चरित नायक अब छात्रों के नायक बनकर राश्ट्रीय परिपेक्ष्य में छात्र आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने के अभियान में जुट गये। इन्होंने अंग्रेजों द्वारा विद्यालयों में प्रतिबंधित प्रार्थनागीत ष्ष्बन्देमातरम्!ष्ष् को पुनः संचालित कराने हेतु छात्रों की मुकम्मल हड़ताल करवा दी। अन्ततः सरकार झुकी और ष्ष्बन्देमातरम्!ष्ष् पुनः विद्यालयों का प्रार्थना गीत बना।
सन् 1942 के जून माह में महात्मा गांधी के संदेश वाहक युसुफ मेहर अली ने कपिलदेव बाबू और उनके क्रान्तिकारी साथियों को मुजफ्फरपुर जाते समय सूचित किया कि स्वतंत्रता की निर्णायक लड़ाई अब नई षैली में लड़नी है। सभी स्वतंत्रता सेनानियों को भूमिगत रहकर नृशंस अंग्रजी हुकूमत को पस्त और ध्वस्त करने के लिए उसके सभी संचार तंत्रों को नश्ट कर देना है ताकि विवश होकर वह भारत छोड़ने को बाध्य हो जाए। इसी संदर्भ में 31 अगस्त 1942 को कपिलदेव बाबू ने अपने विश्स्त साथियों यथा कुमार कालिका सिंहए मुन्दर शर्माए रामउदार र्मा एवं जगदीष सिंह को लेकर जिले भर में क्रान्ति सूत्र संचालन के लिए युद्ध समितियाँ बनाई। साथ ही उसे परंपरागत अस्त्र.शस्त्र संचालन का प्रषिक्षण दिलाकर संभावित युद्ध के लिए तैयार किया। कालान्तर में उन्होंने इस कार्य के विस्तार के लिए बनारसए गोरखपुर एवं पड़रौना का दौरा किया।
नवम्बर 1942 में जब जे0 पी0 का जेल से पलायन हुआ तो कपिलदेव बाबू और इनके क्रान्तिकारी साथियों का मनोबल और उत्साह आकाष छूने लगा। उन्होंने अपने कुछ क्रान्तिकारी साथियों के साथ योजना बनाई कि अगले मार्च महीने में छपरा जेल में कैद अपने सभी क्रान्तिकारी साथियों को जेल का फाटक तोड़कर मुक्त करा लिया जाए। पर योजना सफल न हो सकी। नकद इनाम और नौकरी पाने के लालच में किषोरी सिंह नामक एक सिर फिरे नवयुवक की गुप्त सूचना पर अपनी योजना की कार्यान्विति में भूमिगत रहे कपिलदेव बाबू को फरवरी 1943 की ठिठुरन भरी ढ़लती अंधेरी रात में गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद आपको छपरा मंडल कारा में रखा गया। अचानक गिरफ्तारी से आपका मन खिन्न हो गया। आपकी क्रान्तिकारी योजनाएँ स्थगित हो गई। पर आप में कुछ अनहोनी कर गुजरने की अतुरता बनी रही। जेलर की बेहुदी हरकत ने आग में घी डालने का काम किया। आप दुस्साहस कर जेल की ऊपरी मंजिल पर चढ़ गये और वहीं से पाष्र्ववत्र्ती जेलर के अवास पर बम प्रहार कर दिया। जेलर तो बच गया पर उसका आवास क्षतिग्रस्त हो गया। आपको कठोर नियंत्रण में रखने हेतु क्रमषः पटना और केन्द्रीय कारा भागलपुर स्थानान्तरित कर दिया गया। पर आपकी क्रान्ति धर्मिता रूकी नहीं। भागलपुर सेंट्रल जेल में जेलर की मनमानी पर कपिलदेव बाबू और इनके साथियों का आक्रोष भड़का और इन लोगों ने जमकर जेलर की मनमानी का विरोध किया। देखते ही देखते अंग्रजी क्रूरता का जघन्य तांडव षुरू हो गया। आकाष फट पड़ा और इन लोगों पर घनघोर लाठियाँ बरसानी षुरू हो गई। कपिलदेव बाबू का सर फूटने से बेहोश हो गये। एक आँख क्षतिग्रस्त हो गई। मुँह से खून की धरा बह निकली। मरनासन्न स्थिति में इन्हें पटना सदर अस्पताल लाया गया। वहाँ से इन्हें षीघ्र राँची नेत्र चिकित्सा केन्द्र रेफर किया गया। लम्बे अरसे के इलाज के बाद भी वे आधा.अधूरा ही स्वथ्य हो सके। अंग्रजी सरकार की सनक तब भी शान्त नहीं हुई। इन्हें अपने गाँव भेजकर अपने ही घर में नजर बन्द कर दिया गया। सच्चाई तो यह रही कि इस शर को नियंत्रण में रखते.रखते अंग्रजी शासन के पसीने छुट गये।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। पूरे देश में दिवाली मनी। लम्बे संघर्श की भावनाएँ घनीभूत हो गई। कपिलदेव बाबू का कवि जाग उठा। उनकी निम्नांकित कविता श्रोताओं का मर्म छू गईः.
कुर्बानियों की अपनी न हम दाम चाहते हैं।
सिर्फ लब पे तुम्हारे अपना नाम चाहते हैं।।
तदुपरांत कपिलदेव बाबू का निर्मोक बदला और वे गीता अनुगामी हो गये। इन्होंने षिक्षा और ज्ञान दान को समाज सेवा का उत्तम माध्यम मानते हुए इसके उत्थान के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया। सबसे पहले उनका ध्यान समाज में सेविकाए षूद्र और पषु की श्रेणी में परिगणित होने वाली महिलाओं की दुःखद स्थिति की ओर गया। सााधनहीनता की स्थिति में भी इन्होंने छपरा में सारण प्रमंडल का प्रथम महिला महाविद्यालय स्थापित करने का दृढ़ निष्चय किया। इनके साथियों ने इस कार्य में इनका उत्साहवर्द्धन किया। सम भाव से कपिलदेव बाबू की झोली मालवीय की तरह सहयोग राषि के लिए सब के पास पहुँची। इनका दृढ़ निष्चय 1955 में जयप्रकाष महिला महाविद्यालय छपरा की स्थापना के साथ चमत्कारिक रूप से साकार हो गया। इस महाविद्यालय के अंगीभूतीकरण तक वे संस्थापक सचिव के पद पर आसीन होकर इस महाविद्यालय का चतुर्दिक विकास करते रहे। भारत के तत्कालीन राश्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने आपके युवा उत्साह की सराहना करते हुए षिक्षा के प्रसार पथ पर आपको और अधिक मील का पत्थर गाड़ने का आर्षीवाद दिया।
महामहिम राश्ट्रपति का आर्षीवाद फला। आपने समग्र षिद्वाा.संरचना की अवधारना के अन्तर्गत नवीन किंडरगार्टन पद्धति पर आधारित ब्रजकिषोर किंडरगार्टन की स्थापना 1957 में की। ब्रजकिषोर बाबू के इस संस्थागत पुनर्जन्म पर देष के चोटी के राजनेताओंए मनीशियोंए न्यायविदोंए समाज सेवियोंए साहित्यकारोंए पत्रकारों एवं प्रषासनिक पदाधिकारियों ने षुभकामना संदेष भेजे और प्रत्येक वर्श ब्रजकिषोर बाबू की जयंती के अवसर पर विद्यालय में पधार कर इसके उतरोत्तर विकास एवं अमरता का आर्षीवाद दिया।
कपिलदेव बाबू ने पूर्ण मनोयोग से इस आधारभूत विद्यालय के संवर्द्धन एवं विकास हेतु पूरी पारदर्षिता के साथ लगभग 45वर्शों की सुदीर्घ अवधि तक अपने को जोड़े रखा और अपनी दैनिक उपस्थिति से इसे पितृवत् स्नेह देते रहे। संघर्शों एवं संकल्पों के साथ षिक्षा एवं संस्कृति के प्रसार में सन्नद्ध रहने वाले जीवंत जीवट के जीव कपिलदेव बाबू ने विभिन्न व्यावसायिकए प्राविधिक एवं षैक्षणिक क्षेत्रों में प्रवेष का द्वार खोलनेवाली माध्यमिक एवं उच्चत्तर माध्यमिक ;10$2द्ध षिक्षा संरचना के अन्तर्गत 1994 में सी0 बी0 एस0 ई0 पैटर्न का हाईस्कूल खोलने का निष्चय किया। एतद् संबन्धी अनुमति प्राप्त करने की कारवाई के साथ ही क्रमिक रूप से इन्होंने सी0 बी0 एस0 ई0 पाठ्यक्रमानुसार पढ़ाई की व्यवस्था भी की। इसी परिप्रेक्ष्य में कपिलदेव बाबू ने छपरा के साँढ़ा क्षेत्र में अर्जित 3द्ध एकड़ के मनोरम भू.खंड पर 20 अप्रैल 2000 को छपरा सेंट्रल स्कूल के अत्याधुनिक बहुमंजिले विद्यालय भवन का षिलान्यास किया। निर्माण कार्य आपके निर्देषन एवं निरिक्षण में चल ही रहा था कि सहसा आप रूग्ण हो गये। फलतः विद्यालय प्रबंधन ने संकल्पों के धनी एवं युवात्साह के पर्याय आपके ज्येश्ठ पुत्र डा0 पंकज कुमार को आपके दायित्वों के निर्वहन का कार्यभार सौंपा। पर 1935 से निरंतर 65 वर्शों तक अपने पुंग पौरूश की प्रभा से छपरा और उसकी माटी को षिक्षा एवं संस्कृति के सुगन्ध से सुगन्धित करते हुए आप जुलाई 2001 को स्वर्ग सिधार गये ताकि उस अकल्पनीय और आध्यात्मिक ऊँचाई से हमारे धैर्यए साहस एवं निश्ठा से सेवित इन संस्थाओं का उत्कर्श माप सकें। आपके स्वर्गारोहण के बाद विद्यालय का महापरिवार षीलएसदभावए सहयोग एवं सेवाभाव की धनी आपकी सहधर्मिणीए संस्थापिका प्राचार्या श्रीमती धर्मषीला श्रीवास्तव एवं अपने पिताश्री के ज्ञान क्रान्ति को अपने युवा षौर्य से लक्ष्य तक पहुँचने में जुटे विद्यालय सचिव डा0 पंकज कुमार ;भूतपूर्वद्ध सदस्य लोकसेवा आयोगए उत्तर प्रदेषए सम्प्रतिः. राजनीतिविज्ञान विभागए इलाहाबाद विष्वविद्यालयए इलाहाबादए उत्तर प्रदेषय कार्यकारी सचिव राश्ट्रीय विज्ञान अकादमीए भारत एवं इस विद्यालय के संयुक्त सचिव आपके अनुज डा0 नीरज कुमारए महाविद्यालय एवं विद्यालय क्षेत्र के अग्रणीए योग्य एवं अनुभवी षिक्षा सलाहकार प्रो0 महेन्द्र प्रसादए श्री मुरली मनोहर प्रसाद एवं सभी षिक्षकों.षिक्षकेत्तर कर्मचारियों के समन्वित प्रयास से विद्यालय अपने सभी समस्याओं का समाधान कर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। विद्यालय सचिव डा0 पंकज कुमार के योग्य नेतृत्व पर यहाँ के सभी अभिभावकों की आस्था है। वह दिन दूर नहीं जब विभिन्न रोजगार परक षिक्षा एवं समाज के साधन विहीन बच्चों को सांध्यकालीन निःषुल्क षिक्षा परिसर के रूप में विद्यालय को उत्क्रमित करने का स्व0 कपिलदेव बाबू का संजोया सपना शीघ्र ही साकार हो जाए।